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पवित्र कार्तिक मास 6 Oct से प्रारंभ🌷

कार्तिक या दामोदर मास सर्वोत्तम, पवित्र और अनंत महिमाओं से पूर्ण मास है । यह विशेषतः भगवान कृष्ण को अति प्रिय है और भक्त-वात्सल्य से परिपूर्ण है । इस मास में कोई भी छोटे से छोटा व्रत भी कई हज़ार गुना अधिक परिणाम देता है ।

स्कंदपुराण के अनुसार-

‘मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः।
तीर्थ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ।’

अर्थात्‌ भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थ के सदृश ही कार्तिक मास को श्रेष्ठ और दुर्लभ कहा गया है।

‘न कार्तिसमो मासो न कृतेन समं युगम्‌।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थ गंगया समम्‌।’

कहा गया है कि कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।

कार्तिक, भगवान कृष्ण को दीप दिखाने का उत्सव है, और माता यशोदा द्वारा रस्सियों से ऊखल में बांधे गए भगवान कृष्ण (दामोदर) का गुणगान करने का मास है ।

कार्तिक (दामोदर) मास में सभी को निम्नलिखित (अनुष्ठानों) कार्यकलापों का पालन करना चाहिए:

१) प्रतिदिन भगवान कृष्ण को घी का दीपक अर्पण करना और ‘दामोदराष्टकम्’ गाकर उसके तात्पर्य पर चिंतन करना ।

२) सभी को सदैव भगवान हरि का स्मरण करना चाहिए, हरिनाम जप और कीर्तन को बढ़ाना चाहिए ।

३) यथा-संभव वरिष्ठ वैष्णवों से श्रीमद-भागवतम का श्रवण करना। भागवत श्रवण के लिए अन्य व्यर्थ के कार्यों का त्याग कर देना चाहिए । गजेन्द्र मोक्ष जैसी अन्य सम्पूर्ण आत्मसमर्पण जैसी कथाओं का अधिक से अधिक श्रवण, अत्यंत लाभकारी होता है।

४) एकमात्र कृष्ण प्रसाद ही ग्रहण करना (खाना) चाहिए ।

५) श्रीचैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित ‘श्री शिक्षाष्टकम्’ का प्रतिदिन उच्चारण तथा मनन करना चाहिए।

६) श्री रूप गोस्वामी कृत ‘उपदेशामृत’ का प्रतिदिन पठन करना चाहिए ।

७) तुलसी महारानी को प्रतिदिन जल तथा दीपदान करना चाहिए एवं प्रार्थना करनी चाहिए की वे हमें श्री राधा-कृष्ण के चरणों की सेवा प्रदान करें ।

८) भगवान के लिए स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाना चाहिए।

९) ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए ।

१०) दैनिक जीवन में तपस्या का आचरण करना चाहिए ।

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‘श्री दामोदराष्टकम्’ (सत्यव्रतमुनि कृत)

नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपं
लसत्-कुण्डलं गोकुले भ्राजमनम्
यशोदा-भियोलूखलाद् धावमानं
परामृष्टम् अत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १॥

वे भगवान् जिनका रूप सत, चित और आनंद से परिपूर्ण है, जिनके मकरो के आकार के कुंडल इधर उधर हिल रहे है, जो गोकुल नामक अपने धाम में नित्य शोभायमान है, जो (दूध और दही से भरी मटकी फोड़ देने के बाद) मैय्या यशोदा की डर से ओखल से कूदकर अत्यंत तेजीसे दौड़ रहे है और जिन्हें यशोदा मैय्या ने उनसे भी तेज दौड़कर पीछे से पकड़ लिया है ऐसे श्री भगवान को मै नमन करता हूँ ।।1।।

रुदन्तं मुहुर् नेत्र-युग्मं मृजन्तम्
कराम्भोज-युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्।
मुहुः श्वास-कम्प-त्रिरेखाङ्क-कण्ठ
स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्ति-बद्धम् ॥ २॥

(अपने माता के हाथ में छड़ी देखकर) वो रो रहे है और अपने कमल जैसे कोमल हाथो से दोनों नेत्रों को मसल रहे है, उनकी आँखे भय से भरी हुई हैं और उनके गले का मोतियो का हार, जो शंख के भाति त्रिरेखा से युक्त है, रोते हुए जल्दी जल्दी श्वास लेने के कारण इधर उधर हिल-डुल रहा है , ऐसे उन श्रीभगवान् को जो रस्सी से नहीं बल्कि अपने माता के प्रेम से बंधे हुए हैं, मैं नमन करता हूँ ।।

इतीदृक् स्व-लीलाभिर् आनन्द-कुण्डे
स्व-घोषं निमज्जन्तम् आख्यापयन्तम्।
तदीयेषित-ज्ञेषु भक्तैर् जितत्वं
पुनः प्रेमतस् तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३॥

ऐसी बाल्यकाल की लीलाओ के कारण वे गोकुल के रहिवासीओ को आध्यात्मिक प्रेम के आनंदकुंड में डुबो रहे हैं, और जो अपने ऐश्वर्य सम्पूर्ण और ज्ञानी भक्तों को ये बतला रहे हैं कि “मैं अपने ऐश्वर्य हिन और प्रेमी भक्तों द्वारा जीत लिया गया हूँ”, ऐसे उन दामोदर भगवान को मैं शत्-शत् नमन करता हूँ ।।

वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चन्यं वृणे ‘हं वरेषाद् अपीह।
इदं ते वपुर् नाथ गोपाल-बालं
सदा मे मनस्य् आविरास्तां किम् अन्यैः ॥ ४॥

हे भगवन्, आप सभी प्रकार के वर देने में सक्षम होने पर भी मैं आप से ना ही मोक्ष की कामना करता हूँ, ना ही मोक्षका सर्वोत्तम स्वरुप श्रीवैकुंठ की इच्छा रखता हूँ, और ना ही नौ प्रकार की भक्ति से प्राप्त किये जाने वाले कोई भी वरदान की कामना करता हूँ । मैं तो आपसे बस यही प्रार्थना करता हूँ कि आपका ये बालस्वरूप मेरे हृदय में सर्वदा स्थित रहे, इससे अन्य और कोई वस्तु का मुझे क्या लाभ ?

इदं ते मुखाम्भोजम् अत्यन्त-नीलैर्
वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश् च गोप्या।
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्य् आविरास्ताम् अलं लक्ष-लाभैः ॥ ५॥

हे प्रभु, आपका श्याम रंग का मुखकमल जो कुछ घुंघराले लाल बालों से आच्छादित है, मैय्या यशोदा द्वारा बार बार चुम्बन किया जा रहा है, और आपके ओठ बिम्बफल जैसे लाल हैं, आपका ये अत्यंत सुन्दर कमलरुपी मुख मेरे हृदय में विराजीत रहे । (इससे अन्य) सहस्त्रो वरदानों का मुझे कोई उपयोग नहीं है ।

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःख-जालाब्धि-मग्नम्।
कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानु
गृहाणेष माम् अज्ञम् एध्य् अक्षि-दृश्यः ॥ ६॥

हे प्रभु, मेरा आपको नमन है । हे दामोदर, हे अनंत, हे विष्णु, आप मुझपर प्रसन्न होवें (क्यूंकि) मैं संसाररूपी दुःख के समुन्दर में डूबा जा रहा हूँ । मुझ दीनहीन पर आप अपनी अमृतमय कृपा की वृष्टि कीजिये और कृपया मुझे दर्शन दीजिये ।।

कुबेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ च।
तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मे ‘स्ति दामोदरेह ॥ ७॥

हे दामोदर (जिनके पेट से रस्सी बंधी हुयी है वो), आपने माता यशोदा द्वारा ऊखल में बंधे होने के बाद भी कुबेर के पुत्रों (मणिग्रिव तथा नलकुबेर) जो नारदजी के श्राप के कारण वृक्ष के रूप में मूर्ति की तरह स्थित था !

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